मासूम फिज़ा..

जाने क्यूँ

अश्क़िया अज़ाब का शौकीन है

मासूम फिज़ा पर

कब तक यूँ

रूखेपन की आराईश है

एहतियाज है आशियाने का मग़र

तेरा आलम क्यूँ आवारा है

क्यूँ लफ़्ज़ आहिस्ता से निकले

और बस जीने का भरोसा सौंप गए …

जाने कब तक

यहां काईदा कुदरत क़ल्ब

सब क़यामत के आदी हैं !!!

– विराट

{* अश्क़िया – कठोर हृदय * अज़ाब – पीड़ा * फिज़ा – प्रकृति , * आराईश – सजावट, * एहतियाज – आवश्यकता, * आलम – संसार, *लफ्ज़ – स्वर , * काईदा – नियम, * कुदरत – प्रकृति, * क़ल्ब – दिल , * क़यामत – उथल-पुथल }

{To Russell …}

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ख़ाली क्लास..

आगे की बेंच पर बैठी एक लड़की

उसकी ख़ामोश नज़रें निहारती

श्याम पटल को

हुबहू वैसे जैसे किसी आईने को

किसी की ज़रा सी ख़ट-पट

फिर उसे चौंका देती है

पता है क्यों ?

पूँछा तो यही ज़वाब मिला

यहाँ भी सब घूरते हैं

कायर ज़ुल्म की दास्तां

लंबी है लेक़िन ऐसी भी नहीं

कि रोज़ाना अख़बारों की गिड़गिड़ाहट से

कोई रूबरू नहीं

क्योंकि …उसकी बस नहीं है न

औरों की भी है

जानते सब हैं

सुनने के शौक़ीन भी

लेकिन फ़िर भी रोमन रोमांस सी

प्यास के पुराने आदी हैं सभी

इसलिए क्या करूँ ख़ुद ही…

मैं भी सावधानी ढूंढ़ती हूँ

क्योंकि तुम्हें भी पता है

आज तक मैं तुम लोगों से महफ़ूज़ नहीं !!!

– विराट

MEGHALAYAN AGE FOR DUMMIES: HERE’S ALL YOU NEED TO KNOW ABOUT THE GEOLOGIC ERA

Welcome to the Meghalayan Age! The history of our planet now has a new chapter that began 4,200 years ago and here’s all you need to know about this new geological era.
What is the Meghalayan Age?
Geologists divide up the Earth’s existence into slices of time and have classified a distinct age in Earth’s history, and they’re calling it the Meghalayan Age.
Which is the ‘slice’ that we live in?
We currently live in what is called the Holocene, which reflects everything that has happened over the past 11,700 years. Further, the Holocene is subdivided into three parts, the Greenlandian, the Northgrippian, and the youngest addition, the Meghalayan.
The Greenlandian runs from 11,700 to 8,200 years ago; the Northgrippan runs from 8,200 to 4,200 years ago, and finally, the Meghalayan runs from 4,200 years ago to present.
Is it official?
Yes, Indeed. The International Commission on Stratigraphy has a famous diagram called the International Chronostratigraphic Chart, that depicts the timeline for Earth’s history, and it has been updated.
The commission is the official keeper of geologic time.
They had tweeted about the newly named age via an image of the chart. However, they later issued a correction about the Meghalayan time period. That age goes to the present time and not up to 1950 that they tweeted out by mistake.
The official version of the newly updated International Chronostratigraphic Chart can be viewed here.
The latest version of the International Chronostratigraphic Chart/Geologic Time Scale is now available! New #Holocenesubdivisions: #Greenlandian (11,700 yr b2k)#Northgrippian (8326 yr b2k)#Meghalayan (4200 yr before 1950) https://t.co/IhvZHfHnWh#ChronostratigraphicChart208pic.twitter.com/8Pf9Dnct7h
— IUGS (@theIUGS) July 13, 2018
What is a geological age, and how is it calculated?
You can’t really guess the age of a rock from looking at it. Yet in school kids are taught that Earth is 4.6 billion years old and that dinosaurs disappeared about 65 million years ago and so on. So how do scientists really identify these ages?
They do it by something called geologic age dating, where they assign an age to a material, like a rock, and then calculate the history of the earth by relating it to time, along with with major event in the Earth’s past, such as the break-up of continents, dramatic shifts in climate and more.
This discipline is called geochronology and involves some serious detective work by scientists.
Note four things here: name of the age, time, material (like a rock) and a major event.
In the current era, age, as we all know, is called the ‘Meghalayan’ and the time that has been calculated is 4,200 years to present.
That raises the next question: What is the material that the geologists found?
It’s a rock! A stalagmite which was found in the northeastern Indian state of Meghalaya has provided chemical signatures as evidence. For those who do not know, a stalagmite is a type of a rock formation that forms on the floor of a cave due to the accumulation from ceiling drippings.
This concept of the Meghalayan age, according to a report by the BBC, was first proposed about six years ago, in a scholarly paper.
A portion of an Indian stalagmite that defines the beginning of the Meghalayan Age. Image: IUGS webiste
Why is it called ‘Meghalayan’ though?
The evidence was found in the state of Meghalaya in India, and that’s how the new era gets its name.
Finally, what was the event that marked the beginning of this era?
According to the BBC report, the Meghalayan age began when a mega-drought devastated civilisations across the world, whose effects lasted two centuries. It severely disrupted civilisations in Egypt, Greece, Syria, Palestine, Mesopotamia, the Indus Valley, and the Yangtze River Valley.
For those who dream of travelling back in time, expect no water.
What is the debate around the Meghalayan era then?
The new is always welcomed with objections, and here’s why some researchers have objected to the Meghalaya’s creation.
Currently, there is still an active debate about assigning a new geologic slice of time, other than Holocene, and is being referred to as the Anthropocene.
Mark Maslin is a professor of geography at University College London, told the BBC, “It’s official, we’re in a new age; who knew?” mocking the abrupt imposition of the era.

AMRITA RAJPUT 20 JULY, 2018 16:22 IST

Courtesy : http://www.firstpost.com //Science

बातें करते – करते

ऊब गया हूं अब प्रेम पर लिखते-लिखते

बातें करते – करते पागल से दिखते-दिखते

इसलिए आज ही तोड़ दिया उस आइने को

जिसकी आड़ में सजना -संवरना सीखा था

उम्मीद न थी आईने से कोई कि ऐसा दिन ले आएगा

और मुझको भी कम्बख़त प्रेम का दार्शनिक बना कर जाएगा

कोशिश रही मेरी इस पर.. मैं कम मूक रहूँगा

और हवा सी दर्शन की यह बात सब से कहूंगा

तब शायद लोगों ने मुझे पागल ही समझ लिया

तब -तक जब -तक की उन्होंने स्वयं ही न उसको भुगत लिया

अंततः शहर,गांव, मोहल्लों में कई और दार्शनिकों नें जन्म लिया

और फिलासॉफी की पगडंडी को सभी ने ठीक से पकड़ लिया

जिसमें कुछ-कुछ कर गए और जो कुछ नहीं
वो बस.. फ़ुरसत पागल से टूट रहे ।

– विराट

कुछ बातें..

कुछ बातें जो अब तक बयां न की थी मैंने

जो महज़ इस वक्त की क़ुरबानी थी …

बस चन्द लफ्ज़ ही शेष थे मेरी इस जुबां पर

तब क्यों तूने ख़ैर-खबर मेरी जानी थी ?

ख़ैर अब कोई अफ़सोस नहीं मुझे तेरी उस जुदाई का

या फिर जुदाई में बजी उस शहनाई का

जिसकी फितरत इतनी खोटी ,

की मैंने ज़बरन ही अनसुना कर दिया और वहाँ से चल दिया

अब पैर भी थामे – थमें नहीं , राह मंज़िल कुछ पता नहीं

और दिमाक भी अब कुछ कहे नहीं

यूँ मिलना-मिलाना, घंटो बतियाना ख़त्म हुआ
सब चर्चाओं का अंत हुआ
अब अकेलापन ,प्रश्नों का बवंडर शुरू हुआ
उत्तर भी ख़ुद ही ढूंढ लिया और दोस्त भी ख़ुद को बना लिया
कभी मुस्कुरा लिया तो कभी
धीरे से तकिये की आड़ में रो-गा लिया
फिर संतुष्टि का ज्ञान हुआ, मानो कोई बड़ा आत्मज्ञान हुआ

बस अब रास्ता बदल गया..और
ये जवानी इक मंज़िल पर निकल पड़ी
तब पाठ प्रेम का सब बिसर गया
मैं भले गिरा पर खड़ा हुआ
आख़िर मैंने समय से वक़्त को पकड़ लिया

और अपने को शाही रुतबे में ढ़ाल लिया

भले मेरे पास अभी भी कोई शान नहीं पर ऐसा भी नहीं

की भविष्य से ..मेरी कोई पहचान नहीं

कैसे मैनें अपने को मुरझाए कल से अलग किया ?

इन अमर शब्दों में उसको बयां किया

और इस आज को मैं जीता रहा.. हँसता रहा…गुनगुनाता रहा..

और अब शहनाइयों का लुफ़्त भी खूब उठता रहा।

– विराट

गुलामी..

दास्ताँ- दास्ताँ रह गयी..

जमीं आज़ाद हो चली

अंत हुआ फिरंगी गुलामी का,

वो मर मिटे हैं..

आज़ाद मुल्क का ईल्म कराने वाले

ख़ैर आज कौन सही कहता भला.

क्योंकि यहाँ आज को सही

कल को चुतियापा बोलना

भी तो है कला …

– विराट

पागल है वो..

विराट

लोग कहते हैं..
पागल है वो..औरत
नहीं है.. सलीक़ा उसमें
बात करने का, समझ नही है
रिश्ते-नाते की..
लेकिन रूबरू हूँ ..उसके,
अनपढ़ आँचल रिश्ते से,
उसकी दुलारी बातों से,
जिसकी ममता ने
हर वक्त सभी के लिए ,
अपनी गिरेबां
को खोले रखा..फिर भी
नहीं पता ? ,की लोग
उसे पागल क्यूँ कहते हैं..!

मायूसी..

क्यों ?
ग़म.. की मायूसी में,
चहरे से उतर जाती है..ए रौनक ?
जिसने लपेट रखा है,
कुदरती बनावट को..
मौन के साए में
हिम्मत बांध पार कर
चहरे में छायी इस धुंध..को,
क्योंकि..वो ख़ूबसूरती काफ़ी थी,
किसी को ज़िंदा-दिली इंसान
बनानें में..

विराट

{ To Russell..}

वट वृक्ष..

image

एक शाम यूनिवर्सिटी ग्राउंड में,
बैठे निहार रहा था..
वटवृक्ष की उमंग भरी लताओं को,
जो हवा के झोंको से ..
आज भी उतनी ही फुर्तीली ,
अटल विश्वास के साथ..
हिलोरे मार रहीं थी..
ठीक वैसे.. जैसे अग्रेज़ी हुकूमत के वक़्त,
लेकिन अब बीत चुके है.. सैकड़ो साल,
और वट वृक्ष धारण कर चुका है..
विराट आकार..
जिसकी नभ चूमने को चंचल टहनियां,
आवाज़ दे रहीं हैं अपनी हर लता को,
क्योट रैमी टॉट अर्बोर्स…।

– विराट

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